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झांकती किताब

बहुत दिनो से कलम परेशां थी
सफा बात करने को तैयार न थी,
 ऐसा लगता था मानों लफ्ज़ों की मानी बदल गई है।
 फिर दिल को तस्सली देता, 
                शहर से बातें करता, 
रोशनी में खुद को ढूंढता,
फिर मिरे अलमारी के इक कोने से झांकती किताब कहती
"तुं एक ख़ूबसूरत रंग है दीवार का अपनी 
अगर निकला तो शहर वालों की नादानी से निकलेगा"
......जीव

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