बहुत दिनो से कलम परेशां थी सफा बात करने को तैयार न थी, ऐसा लगता था मानों लफ्ज़ों की मानी बदल गई है। फिर दिल को तस्सली देता, शहर से बातें करता, रोशनी में खुद को ढूंढता, फिर मिरे अलमारी के इक कोने से झांकती किताब कहती "तुं एक ख़ूबसूरत रंग है दीवार का अपनी अगर निकला तो शहर वालों की नादानी से निकलेगा" ......जीव
तुम आदम की जाति के हो सच कहना ! की तुम आदम की जाति के हो , वो बेटी जिस पर जुल्म किया तुमने वो बेटी जिस पर बर्बरता की हद पर किया तुमने वो हव्वा की बेटी कल ही तो मुस्काई थी , जो नन्हें नन्हें पैरो से अभी चलना सीखा था जो तूटे- तूटे शब्दों से अभी अब्बु कहना सीखा था जो टिमटिम करते आँखो से अभी ख्वाब सजाना सीखा था जो नन्हें नन्हें हाथों से अभी बादल पकड़ना सीखा था तुमने उसको काट दिया अरे सच कहना ! की तुम आदम की जाति के हो