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Showing posts from June, 2019

झांकती किताब

बहुत दिनो से कलम परेशां थी सफा बात करने को तैयार न थी,  ऐसा लगता था मानों लफ्ज़ों की मानी बदल गई है।  फिर दिल को तस्सली देता,                  शहर से बातें करता,  रोशनी में खुद को ढूंढता, फिर मिरे अलमारी के इक कोने से झांकती किताब कहती "तुं एक ख़ूबसूरत रंग है दीवार का अपनी  अगर निकला तो शहर वालों की नादानी से निकलेगा" ......जीव

दस्तक उसकी चीख पर

तुम आदम की जाति के हो सच कहना !  की   तुम आदम की  जाति  के हो , वो बेटी जिस पर जुल्म किया तुमने वो बेटी जिस पर बर्बरता की हद पर किया तुमने वो   हव्वा की बेटी कल ही तो मुस्काई थी , जो नन्हें नन्हें पैरो से अभी चलना सीखा था जो तूटे- तूटे शब्दों से अभी अब्बु कहना   सीखा   था जो टिमटिम करते आँखो से अभी ख्वाब सजाना  सीखा  था जो नन्हें नन्हें हाथों से अभी बादल पकड़ना   सीखा   था तुमने उसको काट दिया                                                                                       अरे सच कहना ! की   तुम आदम की  जाति  के हो

दस्तक तिरे संवेदना पर

एक अविष्कार कैसे किसी समाज को संवेदन रहित बना सकता है इसका प्रमाण गुजरात की कोचिंग में लगे आग नेे स्पष्ट कर दिया......वैसे यह संवेदनहिनता आज की बात नहीॆ है.....यदि याद हो तो कुछ समय पहले एक तश्विर   केेविन कार्टर द्वारा लिया गया जिसमे एक बच्चे और उसके पीछे बैठे गिद्द को दिखाया गया था.....जो यह स्पष्ट कर रहा था की गिद्द बच्चे के मरने की ताक देख रहा था और इस संवेदन रहित पिक्चर के नाम पर केेविन को   पुलिट्जर    अवार्ड दिया गया था जो   अवार्ड देने और लेने वाले दोनों की संवेदना को जग जाहिर कर रहा था....कुछ ऐसा ही आज देखने को मिला जब सड़क के   लोग   और मिडीया पिक्चर बना रही थी और वह फायर ब्रिगेड का वेट कर रही थी.....यह वह भीड़ थी जो    गुजरात की कोचिंग में लगे आग की तमासा देख रही थी किसी के पास यह जुगाड़ तक न आया की इन बच्चो को बचाया केसे जाये.....यदि कार्टर की इन्टरव्यु को सुना जाये तो वो बताते हुए मिलते है कि "फोटो लेने के बाद गिद्द को भगा दिया था" लेकिन एक भी बार उनके जेहन में यह न आया की ंमेरे जाने के बाद भी गिद्द आ सकता था और शायद य...

दस्तक उनकी आवाज पर

कभी कभी कमप्युटर पर ऊंगीलिया घुमाते रहों तो कुछ ऐसे लोगो से मुलाकात हो ही जाती है  की मानों उनको सुनकर जिन्दगी रस मय हो गई हो और जब उनको ध्यान से देखो और सुनों तो लगता है की कितनी आसानी से अपनें इरादोें अपनी  महत्वाकांक्षाओं  की गला दबाकर बड़ी सरलता से जीवन को स्विकृति दे दी हो की हाँ तुम ही सही हो जिन्दगी इसलिये तुमहें सलाम करती हूँ और वैसे भी तुम से लड़कर पार भी नहीं जाया जा सकता न.... ऐसे ही एक सरल चेहरे से इक सरल गीत से जो कभी बचपन में कजरी के रुप में सावन में सुना करता था....आज वही कजरी फेसबुक पर इक महिला से सुनने को मिला.....जी हाँ! और मन रोमाचित हो उठा..... उनको देखकर यूं लगा की वो शायद ग्वालियर से हों या फिर बनारस से......वैसे वो कहीं से भी हो लेकिन यह स्पष्ट था की उन्हों ने इस विधा का गहन अध्यन किया होगा किसी गुरू से या फिर उस मिर्जापुर के अखाड़े पर बैठ कर उन महिलाओं के साथ, जो इस कजरी में निपुड़ रही होगी....वैसे न आज कजरी है और न वो  अखाड़े जो विन्धयवासनी की गोंद में पली और बढ़ी जहाँ हर सावन गोरखपुर से लेकर ग्वालियर तक की और उससे भी आगे की महिलाये आकर क...

दस्तक मिरे स्कूल के गेट पर

आज शहर की आबो हवा में खुद को ढुंढ रहा था की तभी नजर मिरा स्कूल के एक गेट पर गया.....और ऐसा लगा की मानों यह वही गेट है जिसको पार कर कभी किसी समय में हमने इसी मन्दिर में बैठकर  किताबों से इल्म हासिल की थी...... लेकिन आज दिखने वाला यह गेट कुछ अजीब सा था क्योकि वहाँ मिरे जमाने में कु़ड़े दानों से लिपटे रैपरो में चाकलेट नहीं बेचे जा रहे थे जो आज वहाँ बेचे जा रहे हैं.....बच्चे मन से उस चाकलेट को खा भी रहे हैं और यही बू से भरा चाकलेट अपने घर तक बंद बस्तों में भर कर ला रहे हैं....फिर मुझे मिरे शहर की इक बात याद आई,... "मिरा शहर इक अजीब सा शहर है...यह वही जगह हे जहाँ बन्द बस्तों मे बच्चे बू भर कर अपने घर और घर से विद्दालय ले कर आते-जाते रहे हैं.....ओर जब कोई इन्हें साफ करने की कोशिस करने आया है तो उसे वो नकार दिये है....यह दोष उन बच्चों का नहीं होता है क्योकि यह बू उन्हे एक चाकलेट की तरह लगती है जो उनके सरपरस्तों ने उन्हें 10-12 वर्षों से लगातार परोसते आ रहे हैं.....तो उन्हें क्यों एक स्वास्थ्य वर्धक भोजन अच्छा लगे.....वो तो बस इस बू से लिपटे हुए चाकलेट को ही खाना पंसद करेगें.....और ...