आज शहर की आबो हवा में खुद को ढुंढ रहा था की तभी नजर मिरा स्कूल के एक गेट पर गया.....और ऐसा लगा की मानों यह वही गेट है जिसको पार कर कभी किसी समय में हमने इसी मन्दिर में बैठकर किताबों से इल्म हासिल की थी......
लेकिन आज दिखने वाला यह गेट कुछ अजीब सा था क्योकि वहाँ मिरे जमाने में कु़ड़े दानों से लिपटे रैपरो में चाकलेट नहीं बेचे जा रहे थे जो आज वहाँ बेचे जा रहे हैं.....बच्चे मन से उस चाकलेट को खा भी रहे हैं और यही बू से भरा चाकलेट अपने घर तक बंद बस्तों में भर कर ला रहे हैं....फिर मुझे मिरे शहर की इक बात याद आई,... "मिरा शहर इक अजीब सा शहर है...यह वही जगह हे जहाँ बन्द बस्तों मे बच्चे बू भर कर अपने घर और घर से विद्दालय ले कर आते-जाते रहे हैं.....ओर जब कोई इन्हें साफ करने की कोशिस करने आया है तो उसे वो नकार दिये है....यह दोष उन बच्चों का नहीं होता है क्योकि यह बू उन्हे एक चाकलेट की तरह लगती है जो उनके सरपरस्तों ने उन्हें 10-12 वर्षों से लगातार परोसते आ रहे हैं.....तो उन्हें क्यों एक स्वास्थ्य वर्धक भोजन अच्छा लगे.....वो तो बस इस बू से लिपटे हुए चाकलेट को ही खाना पंसद करेगें.....और उन्हें यह खाना ही पड़ेगा..... क्योकि जो मुतालबा रखते है बू हटाने का, उनकोॆ आज के शार्गिदों और उनके सरपस्तो ने नकार दिया है....जुबैर शाहब ने सही ही कहा है
**चलो कोसते हैं फिर शहर को**
"क्योकि तुम्हारे शहर से कुड़ो को हटाने का मुतालबा वाले ने आँखे फेर लिया है"
"बच्चों उस्तादों और सर-परस्तों ने स्कूलों के सामने बरसों पुराने बदबू भरे कूड़े-दानों को हटाने का मुतालबा छोड़ दिया है."
ज़ुबैर रिज़वी
bahut achha sir
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